ख़ामोश बातें

आज वो मिली तो कुछ चुप चुप सी थी। खामोश, शांत, खोई हुई सी। यूँ तो कार में बैठे चंद मिनट ही बीतेkl थे उसे। पर जो शख़्स 100 शब्द प्रति मिनट की तेज़ी से बात करता हो, वो अगर 5 मिनट भी चुप बैठ जाए तो समझो ज़माना गुजर जाता है।

कार की सीट पर बैठी, अपनी एक लट को सीधे हाथ के अंगूठे और मध्य ऊँगली में दबाये, तर्जनी ऊँगली को उस लट  में घुमाती घुमाती, बड़ी बाड़ी मगर सूनी आँखों से खिड़की से बाहर देखे जा रही थी। 

पर वो देख क्या रही रही थी? आसमान में तारे भी तो नहीं थे।  इस शहर में तारे दिखते ही कहाँ हैं।  यहां तो लोग आलिशान इमारतों की जगमगाती बत्तियों को देख कर ही खुश हो जाते हैं, या फिर ऊंचे ऊंचे सपनों को देख सुख पा लेते हैं।  पर वो तो ऐसी ना थी, काला धुंधला आसमान और ऊंची इमारतें  उसे कभी ना भाई थीं।  वो अक्सर इनकी शिकायत मुझसे करती और इस शहर से कहीं दूर निकल चलने की ज़िद्द करती रहती।

 शायद कार के स्टीरियो का गाना उसे बेहद पसंद आ गया था ? उसमें किशोर दा  अपनी मेहबूबा की जीवन भरी आँखों से जीने की प्रेरणा ले रहे थे और उसके रूप का रस पाने के लिए सागर तरस रहा था। ये कवि, गीतकार और लेखक ना जाने कौन कौन से अलंकारी शब्दों से अपनी महबूबा को रिझाते रहते हैं। क्या असल ज़िंदगी में भी ऐसा होता है? या होता होगा शायद, पर मैं शब्दों का ये जादू कभी नहीं सीख पाया।  सीधे सरल शब्दों में बात करने की मेरी आदत कह लो  या तारीफों के पुल  बाँधने की हिचक, पर मैं कभी उसके रूप को बयान ना कर पाया।  आखिर खूबसूरती और प्यार शब्दों के मोहताज़ तो नहीं ? या होते होंगे शायद , आज कल की दुनिया में । 

खैर ये किशोर दा के शब्दों का जादू तो नहीं ही था जो उसे इस कदर चुप्पी के प्रदेश ले जा सके। क्यूंकि जब कभी उसे कोई गीत पसंद आता तो, गीत के साथ साथ वो भी गुनगुनाने लगती , जैसे गीतकार को चुनौती दे रही हो।  नया, पुराना, हिंदी, अंग्रेज़ी हर गीत उसे मुँह ज़ुबानी याद था।  तभी तो मैं उसे ” गीतों का चलता-फिरता पुस्तकालय” कहता था।  पर आज वो गुनगुना नहीं रही थी।  गीतों का ये भण्डार आज गुमसुम था। बस एकटक बाहर देखे जा रही थी।  तो क्या वो कुछ सोच रही थी?

दिन भर गाड़ियों से लबा लब भरी मगर रात को सुनसान पड़ी सड़कों पर गाडी दौड़ाता मेरा दिमाग रह रह कर उसके ख्यालों के दायरे के इर्द गिर्द घूमता और फिर खाली हाथ लौट आता। खामोशी के उस पार जाने की हिम्मत ना होती उसकी।  या शायद जाना ही नहीं चाहता था वह।  पता था शायद उसे, के दायरे के उस पार क्या है। इस खामोशी के पीछे का राज़ क्या है। इस शान्ति के उस पार का तूफ़ान क्या है।  और वह उन ख्यालों को छूने से, पढ़ने से डर रहा था।  दिमाग भी हमारे भीतर एक अलग ही शख्सियत बनाये बैठा रहता है और हर परिस्थति का सामना करने से पहल ही जैसे हमें आगाह करता रहता है।

वह मुझसे बार बार कहता रहा की अगर आज हिम्मतों के पुल  बाँध और साहस का दरिया लांघ इसने तुझसे कह दिया, कह दिया के देखो.. देखो हम दोनों जानते हैं की इसके बाद क्या होना है, आगे बढ़ने में कुछ भी तो नहीं रखा है तो अब यहीं रुक जाते हैं , और…

इससे आगे मेरा दिमाग कुछ कहता, मेरे दिल ने  उसे डाँट डपट  कर चुप करा दिया। मैंने अपनी सोच के बिखरे पुलिंदे समेटे और चुपचाप स्टीयरिंग को दोनों हाथ से जकड़ लिया।  जगमगाती सड़कों पर, अपने ख्यालों के अँधेरे में खोया, मैं गाडी दौड़ाता रहा।  एक दुनिया को कई दुनियाओं से जोड़ता हवाई अड्डा अब  हमारे सामने था।   

मैंने उसके भारी भरकम सूटकेस को उसके हवाले किया, उसे गले से लगाया और अलविदा कहा। खाली हाथ और एक भरा दिल लिए मैं अपने घर की ओर  लौट गया।  इस हवाई अड्डे पर फिर कभी ना आने के लिये।

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