किताब

शादी के बरसों बाद आज घरआई थी मैं। पता ही नहीं चला के कैसे बरसों बीत गए, बीते कुछ सालों को जिया तो है मैंने मगर महसूस नहीं किया। सुना था शादी के बाद लड़की का घर पराया हो जाता है। पर नहीं पता था कि इस कदर पराया हो जाता है जैसे बचपन का साथी, स्कूल। जहां हज़ारों यादें होती हैं, सपने होते हैं , साथ पढ़ने वाले बस कुछ ही पराए और बाकी सब अपने होते है। जहां आपने कसम खाई होती है इस जगह को कभी ना भूलने की। कुछ वादे किये होते हैं , दोस्तों के संग हर साल यहां आकर मिलने के। जिस जगह को आखिरी बार आँख भर देख कर कहते हैं – तू फ़िक्र ना कर, मैं फिर आउंगी और आती रहूंगी।

पर स्कूल की उस बिल्डिंग से किया वादा और अपनी माँ के घर से किया वायदा एक जैसा निकलेगा ये सोचा न था। हाँ माँ का घर, यही तो रह गया था अब यह। ससुराल में अक्सर सुनने को मिलता था ये – माँ के घर में ऐसा, मान के घर में वैसा, माँ के घर से ये और वो, जाने क्या क्या। बस “माँ का घर ” हर बार उपयोग होता था। कभी कभी तो माँ भी फोन पर यह कह देती थी – “माँ का घर तो भूल ही गई तु “। जैसे मेरा कभी रहा ही ना हो। कितना विचित्र है ना ये, जिस घर में आप अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हिस्सा जी लेते हो, वो आपका अपना होता ही नहीं। कभी कभी सोचती हूँ, अगर भाई होता तो उसे भी ये याद दिलाया जाता? क्या उसके लिए भी ये माँ का घर होता? क्या उसका भी बचपन, पराए घर में बीता होता?

बरसों बाद इस घर में कदम रख कर ऐसा लगा जैसे वक़्त की सूइयां उलटी घूमने लगी हों । इस घर में बिताया एक एक पल आँखो के सामने से दौड़ता चला गया। जैसे धूप पीछे हटती चली जा रही हो और मैं उसके पीछे पीछे दौड़ती हुई, उसे पकड़ने की एक नाकाम से कोशिश कर रही हूँ। हाथ बढ़ा कर मुट्ठी भींच लेती हूँ पर जब आँखों के सामने मुट्ठी खुलती है तो उसे खाली पाती हूँ। कुछ उसी तरह बचपन भी आज आँखों के सामने से भागता चला जा रहा था और लाख कोशिश करके भी मैं उसे पकड़ नहीं पाई ।

सूटकेस रख कर अभी बेड पर बैठी ही थी की नज़र सामने पड़े उस पुराने डब्बे पर पड़ी जो मैंने शादी से एक रात पहले सहेज कर रखा था और माँ को हिदायत दी थी, के अगर इस डब्बे को किसी ने छुआ तो मुझसे बुरा कोई ना होगा। समझ लेना! मैं तो ये कही बात और ये डब्बा ,दोनो ही भूल गई थी, पर लगता है माँ नहीं भूल पाई। वो भी तो सोचती होंगी के शादी ही तो हुई है, अभी तो हूँ इस दुनिया में ही। कभी भी आ धमकुंगी और फिर उसी पुराने हक़ से अपनी हर चीज़ के लिए झगड़ा करुँगी जैसे पहले करती थी। अपनी चीज़ों को लेकर मैं हमेशा से ही बहुत ही मालिकाना और सजग रही थी। एक बार जल्दी जल्दी में दीदी मेरा पसंदीदा क्लचर लगा कर दफ्तर चली गई थीं तो पूरा आसमान सर पर उठा लिया था मैंने । माँ ने पापा की कसम दी थी तब कहीं जा कर मैं शांत हुई थी। पापा तो नहीं रहे थे पर कसमों में उन्हें ज़िंदा रखा था हम तीनों ने।

ज़िद्दी तो मैं अब भी थी पर अपने सामन पर हक़ जताना मैंने छोड़ दिया था। ज्वाइंट फैमिली में रहते हुए 5 साल बीत गए थे… वक़्त ने धीरे धीर सब सीखा दिया था। हालातों से समझौता भी।

यही सब सोचते हुए हाथों ने उस डब्बे को उठा लिया जिसमे मैंने अपनी ज़िन्दगी की हर कीमती चीज़ रख कर ढक्कन बंद कर दिया था। शादी से पहले की उस आखिरी रात , इसमें रखी हर एक चीज़ को एक बार फिर सीने से लगाया था मैंने। वो बचपन की गुड़िया। पापा की दी पहली घडी। दीदी का दिया वो आइना जिसमें मैं दिन में 100-100 बार अपना चेहरा देखती थी। मेरी सैलरी का वो पहला चेक जो मैंने कभी कॅश ही नहीं करवाया। नौकरी तो मैंने शौक में कर ली थी, पैसों की ज़रुरत नहीं थी उन दिनों । पापा ने कई बार कहा था, ज़रूरत ही क्या है ऐसे बसों में धक्के खा कर 2500 कमाने की। मैं कभी समझा नहीं पाई उन्हें , वो आज़ादी का एहसास जो इस 2500 से कहीं अधिक था। यही सब सोचते हुए मेरी उँगलियाँ डब्बे को तलाशते हुए बीते वक़्त में खींचे जा रही थी । ग्रुप हेड का विजिटिंग कार्ड, मेरा फेवरेट दुपट्टा, पापा का लॉकेट, माँ के हाथ का कंगन जो टूट तो गया था मगर उस पर की गई मेरी कारीगरी अभी भी ज़िंदा थी। फेंक दिया था माँ ने वो कूड़े में टूट जाने पर, लेकिन मैं चुपके से उठा लाई थी। भला ऐसे कोई यादों और प्यार को फेंक देता है क्या ? ऐसी कई चीज़ें थीं मेरी इस डब्बे में, यादों का पूरा कारवाँ था। उम्र के हर पड़ाव, हर साल की याद, ज़िन्दगी में आए हर महत्वपूर्ण शख्स की एक याद।

मैं डब्बे को टटोले जा रही थी और जिए जा रही थी इन चीज़ों से जुड़े हर लम्हे को। और.. और तभी मेरी नज़र इस किताब पर पड़ी। झट से हाथ बढ़ाया था उसे उठाने के लिए लेकिन, हाथ जैसे जम से गए थे। कुछ पल देखती रही उसे मैं एक टक और फिर सारा सामान वापस डब्बे में रख कर बंद कर दिया। किताब फिर से सबसे नीचे दबा दी थी, जैसे उससे जुडी यादें, कि उन तक पहुँचना आसान ना हो। पर यादों को आप दबा तो सकते हैं, क्या भुला भी सकते हैं ?

तुम्हारी दी इस किताब ने आज मेरी यादों में हलचल मचा दी थी। जैसे शांद पड़ी झील के किनारे खड़े पेड़ ने उसे नींद से जगाने के लिए उसमें एक पत्ता गिरा दिया हो। और उस पत्ते के गिरने से उठी एक हलकी सी जल तरंग ने पूरी झील में हलचल मचा दी हो। हमारे मिलने की पहली मासिक सालगिराह थी वो। ऐसे ही तो मनाते थे हम साथ बिठाये हर पल को , दिनों में महीनो को और महीनो में सालो को और सालों में पूरी ज़िन्दगी को, जैसे पहले से पता हो हमें की कुछ सालों का ही मोहताज़ है हमारा रिश्ता। यूँ तो उन 2 सालों में सैकड़ों तोहफे दिए थे तुमने मुझे, पर यह पहला तोहफा मेरे दिल के सबसे करीब था। ये मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आगमन की निशानी था।

किताबों का शौक नहीं था मुझे , स्कूल के बाद मैं उनसे ऐसे भागती थी जैसे भूत देख लिया हो मैंने। पर तुमने तो जैसे किताबों को ही अपनी ज़िन्दगी बना रखा था। उठते, बैठते, सोते जागते, हर वक़्त कोई ना कोई किताब तुम्हारे इर्द गिर्द होती थी, जैसे तुम्हारी सोच का दायरा, जिसमें कभी कोई दाखिल नहीं हो पाता था, मैं भी नहीं। जलन होती थी मुझे इन किताबों से। कि मैं क्यों नहीं हर वक़्त इन्हीं की तरह तुमसे चिपकी रह सकती , मैं क्यों नहीं इनमे लिखे शब्दों की तरह तुम्हारी आँखों से होते हुए तुम्हारे मस्तिष्क की जटिल सोच में दाखिल हो पाती। पर कह नहीं पाती थी तुमसे, जानती थी तुम किताबों के खिलाफ कुछ सुन नहीं सकते थे। तो मैंने भी इन्हें अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा मान अपना लिया था और बिना इस दायरे को छुए तुम्हारे इर्द गिर्द मंडराती रहती थी। इस इंतज़ार में कि कब तुम अपनी उस दुनिया के दायरे को लांघ इस तरफ आओगे। और जब तुम अपनी तलाश को पूरा कर या शायद कुछ देर के लिए अधूरा छोड़ आ जाते थे इस दुनिया में तो तुम्हारे साथ बिताए वो कुछ पल मेरी ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल होते थे। कुछ पलों के लिए ही सही पर तुम किताब को भूल सिर्फ मेरे होते थे।

महीनो तक तुम मुझसे पूछते रहे कि मैंने किताब पढ़ी या नहीं पढ़ी और मैं वक़्त का बहाना डाल टाल देती थी। नहीं कह पाती थी तुमसे कि जो तुम्हारे लिए ज़िन्दगी है वो मेरे लिए वक़्त की बर्बादी। तुम जिस चीज़ के बिना रह नहीं पाते मैं उससे कोसो दूर भागती हूँ। कितने अलग थे ना हम दोनों ज़मीन और आसमान की तरह। पर सोचा ना था कि हमारे भाग्य में भी ज़मीन और आसमान की तरह एक होना नहीं लिखा था। आप दूर कहीं एक दूसरे को लगभग मिलता तो देख पाते हो पर वो कभी मिल नहीं पाते।

खाना खा कर करवटें बदलते हुए मैं किसी तरह सो तो गई थी मगर अचानक आँख खुल गई। उठने की वज़ह तो वही सवाल थे जिन्होंने मुझे इतने सालों में चैन से सोने नहीं दिया मगर आज उन सवालों के साथ एक उम्मीद भी थी। कुछ जवाबों की उम्मीद। इस उम्मीद ने मेरे दिन भर के नियंत्रण की दिवार को एक झटके में गिरा दिया। बत्ती जलाई और डब्बे का सारा सामान बेड पर उड़ेंल दिया। किताब को देख वे सवाल फिर दिमाग में गूंजने लगे ।

जो मेरे बिना जी नहीं सकता था और मैं जिसके बिना जीने का सोच नहीं सकती थी उसने मुझे खुद से एक झटके में अलग कैसे कर दिया ?

आखिर क्यूँ तुम मुझसे ये वादा लेकर कहीं चले गए कि मैं तुमसे कभी बात करने की कोशिश ना करूँ ?

कितना रोई थी मैं , गिड़गिड़ाई थी तुम्हें अपनी ज़िंदगी में रखने के लिए। तुम्हारे साथ जीने के लिए। तुम्हारी कही हर स्थिति में तो रहने को तैयार थी। फिर ऐसा क्या हो गया था कि तुमने मेरी एक ना सुनी ?

कितना इंतज़ार किया था मैंने तुम्हारे लौट आने का। गुस्सा आता था खुद पर, झुंझलाहट भी होती थी कि जब तुम ख़ुशी से जी रहे हो तो मैं क्यूँ मरे जा रही हूँ तुम्हारे लिए?

इन सवालों की ओट में खड़ा सबसे बड़ा सवाल था –
ऐसा क्या था जिसने हर हाल में खुश रहने वाले और सबको खुश रहने का सबक देने वाले को मजबूर कर दिया था एक फंदे पर झूल जाने को??? ज़िंदगी का रहस्य समझते समझते मौत को गले लगाने का ख़याल कब और क्यूँ आ गया था तुम्हारे मस्तिष्क में ?

इन सवालों की उधेड़ बुन में, मैं किताब के पन्ने पलटती रही और उसमें लिखी हर बात मुझे ऐसी प्रतीत हुई जैसे मेरे सामने बैठकर तुम खुद ही कह रहे हो वो बातें। पर ऐसा कैसे हो सकता था ? किताब का किरदार हूब हू तुम जैसा था और उसका अंत भी। किताब के आगे पीछे कहीं ना तो लेखक का नाम था ना ही प्रकाशन का। केवल किताब का नाम था – अंतर्मन। तो क्या तुमने खुद लिखी थी ये किताब?

पर तुम ये सब कह भी तो सकते थे मुझसे। आखिर कलम में ऐसा क्या होता है जो वो जुबान पर भारी पड़ जाती है ? तुम कहते रहे थे कि यह किताब मुझे तुम्हें समझने में मदद करेगी। मैं हर बार कह देती कि तुम्हें मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता, तुम्हारी ये किताब भी नहीं। कितनी गलत थी मैं। कुछ लोगों को किताब से बेहतर कोई नहीं जानता।

— किताब

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Published by HimalayanDrives

While living in a city, I often escaped to the mountains to keep a balance within me. These short visits to the Himalayas and a journey of 100 days in Himachal brought me closer to nature and I started listening to the whispers of nature. This page is about converting those whispers to words and carry nature's message for all. I mostly travel solo but sometimes organise trekking camps for people who want to reach closer to nature. Join me for these trips and explore the unexplored.

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