भूख

मेरे यात्री धर्म ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और बतलाया है जो शायद मैं घर की आराम दायक चार दीवारों मे कभी ना जान पाता । अपनी हाल की यात्राओं के दौरान मैंने एक दर्द के एहसास को महसूस किया । कभी-कभी विरल स्थानों पर पहुँच संसाधनों की कमी या समय के अभाव में भूखा ही सो जाना पड़ा । ऐसी ही एक रात जब मैंने दिन भर की थका देने वाली यात्रा के बाद भूखे पेट सो जाने का प्रयास किया तो पेट ने विद्रोह कर दिया। भूख और नींद के बीच की जंग में मैं करवटें बदलता, पेट को कोसता रहा।

कुछ करवटों के बाद दिमाग़ पेट से निकल एक जाने पहचाने से शहर की अनजानी, अंधेरी सड़क पर जा पहुँचा। नज़र चिथड़े में लिपटे, पटरी पर सिकुड़े पड़े कुछ शरीरों पर पड़ती है। अगस्त के महीने में कम्बल को सिर तक ओढ़े, कौन हैं ये शरीर? वो कौनसी शर्मिंदगी है जो इन्हें इस भीषण गर्म रात में भी मुँह को ढकने के लिये मजबूर कर रही है? जिस जगह पर एक स्कूटर भी ठीक से खड़ा नहीं हो सकता उतने में ये 3 इंसानी शरीर कैसे सिमट गये हैं? क्यूँ सिमटे हैं ये ऐसे अपनी टांगों को पेट से चिपकाए, जैसे शर्मिंदा हों अपनी ही टांगों के होने से?

जवाबों की गुफ़ा में सटीक जवाब ढूँढता हुआ मेरा दिमाग़ काठ से पतले उनके शरीर के आकार पर जा टिका। लगा जैसे किसी ने दो लाठियों को 1 बड़ी थाली, 1 पतले से गिलास और एकटेढ़ी मेढ़ी पुरानी कटोरी से जोड़ दिया हो। कुछ ऐसा था उस इंसान का पैर, धड़, गर्दन और चेहरा । टाँगे खुद को छिपाये नहीं, भूखे पेट को दबाये हुए थीं। ना जाने इन्होंने आज रात का खाना छोड़ा या दिन का या शायद दोनो। तीन वक़्त की रोटी के बारे में तो इन्होंने कभी सोचा भी ना होगा। पर भूख से त्रस्त इनका शरीर दिमाग़ को खुद में कैसे समाए हुए है? वो कौनसी इक्छा शक्ति है जो इन्हें इस हालत में भी करवटें बदलने पर मजबूर नहीं कर रही।

करवट, ये याद आते ही दिमाग फिर से लौट आया मेरे शरीर में । टाँगे खुद ब खुद सिकुड़ने लगी, पेट छिप गया टांगों के पीछे जैसे दिमाग ने भूख से निज़ात पाने का तरीका ढूंढ लिया हो। आँखें कुछ ऐसी मिंची की नींद चाह कर भी बाहर ना आ पाई । उस खुली पटरी के ख़याल ने मेरे टेंट को और गरम तथा मेरे मैट को और नरम कर दिया ।

सुबह आँख खुली तो रात के अंधेरे के साथ भूख भी मिट चुकी थी और अपनी यात्रा में मैंने एक और गुर सीख लिया था । भूख से निजात पाने का गुर ।

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