तलाश

मेरी कई बुरी आदतों में से एक है सवाल पूछना। सवाल पूछने की मेरी आदत बचपन से ही है।कोई कुछ बताता तो सवाल पूछता, कोई कुछ सिखाता तो भी सवाल पूछता और किसी को कुछ करता देखता तो भी सवाल पूछने लगता। मेरे सवालों से लोग अक्सर परेशान हो जाते थे, इसलिए कुछ पूछता और कुछ मन में ही रख लेता। 

बचपन में माँ ने कहा की बेटा मन से पढ़ाई किया कर, पढ़ना लिखना बहुत ज़रूरी है तब मैंने पूछा माँ पढ़ना इतना ज़रूरी क्यूँ है? माँ ने कहा पढ़ेगा तो success पाएगा। 

स्कूल गया तो टीचर्ज़ ने कहा इतने सब से नहीं होगा, तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है, मैं फिर सवाल कर बैठा कि कितना सीखना होगा? टीचर ने कहा, जब तक success को नहीं पा लेते।

थोड़ा बड़ा हुआ तो देखा बड़ा भाई दिन रात नौकरी में व्यस्त रहता है, ना मेरे साथ खेलने का वक्त है ना माँ – पापा के साथ बैठकर बातचीत करने का। मैंने उससे भी सवाल पूछ डाला, भाई इतना काम क्यूँ करता है, उसने कहा पैसे कमाने के लिये, मेरे सवालों के पिटारे से एक और सवाल निकल आया इतना पैसा कमा कर क्या होगा? उसने कहा success मिलेगी । मन में सवाल आया – इस एक success  की तलाश में जो सब पास पास होकर भी छूट रहा है, उसका क्या? माँ बाप जो बूढ़े हो रहे हैं उनका क्या? और, और ये success मिलती कहाँ है? मगर उसने कहा जा मेरे पास बहुत काम है। 

इस success के बारे में इतना सुन चुका था कि मैंने भी ठान ली, एक दिन success को पाकर ही रहूँगा और तब सारे सवाल success से पूछूँगा। मैंने सवालों के सिलसिले को थामा और लग गया कमाने में, success को पाने में।

दफ़्तर में एक दिन बॉस को कहते सुना था कि गाड़ी ले ली, gadgets तो सारे latest हैं ही मेरे पास, बस अब घर ले लूँगा तो समझूँगा कि Success मिल गई। 

मुझे लगा अपना घर ख़रीदने से ही success मिलती होगी। एक नई नौकरी मिली, अपना शहर, पुराने दोस्त और घरवाले सब छोड़ने पड़े मगर पैसा अच्छा मिलत और उस पैसे से मिलती success! तो मैं निकल पड़ा।

इस तरह 1 दशक बीत गया, मैंने भी गाड़ी, gadgets और घर ले लिये मगर success कहीं नज़र नहीं आई। दिल अक्सर कहता कि कुछ कमी है। मैं सब छोड़कर अपने शहर वापस लौट आया।

पुराने बॉस के पास गया, बातचीत से पता चला नया घर छोटा लगने लगा है और पिछले साल जो नई गाड़ी launch हुई है वह उसे ले नहीं पा रहे हैं। उन्हें और पैसा चाहिए था, जो नौकरी से हो नहीं सकता तो उन्होंने नया business खोल लिया और काम इतना है कि hypertension की दवाइयाँ लेनी पड़ रही हैं। मैं वहाँ से अपना अपना सवाल लिए चुपचाप लौट आया। 

अगले दिन बड़े भाई के पास गया। बच्चे पढ़ने के लिए अलग-२ शहर जा चुके थे, भाभी हमेशा की तरह अकेले घर में उदास थीं। देर रात भाई दफ़्तर की थकान और अपने बढ़े वजन को लिये हाँफता हुआ आया। उससे भी सवाल  पूछने की हिम्मत नहीं हुई।

माँ-पापा से सवाल पूछना अब सम्भव नहीं था। माँ बीते वर्ष हम सबको छोड़कर जा चुकी थीं। हमें हमारी success के पास छोड़कर। पापा इतने बूढ़े हो चुके थे जितना मैं कल्पना में भी नहीं सोच पाया था।

एक दिन Discovery पर एक documentary में सुना कि प्रकृति के पास हर बात का जवाब है। यह भी जाना कि अब प्रकृति शहरों में नहीं ऊँचे पहाड़ों के वीराने में रहती है। मैंने एक ट्रेक ग्रूप जॉन किया और निकल पड़ा अपने सवालों के जवाब की तलाश में, success  की तलाश में। 

चढ़ाई बहुत कठिन थी, हर थोड़े क़दमों पर मेरी साँस फूल जाती थी। मैं अपने निर्णय पर पछताने लगा। लगा जैसे बीच में ही वापस लौट जाना होगा। मगर कॉलेज के दिनो में किए एक मुश्किल ट्रेक की याद ने हौंसला बनाए रखा। 

दूसरे दिन की चढ़ाई के बाद थका हारा मैं टेंट के बाहर ही घास के क़ालीन पर लेट गया। कितनी शांति थी वहाँ मेरे घर के सारे ऐशो आराम से भी इतना सुकून नहीं मिला था। घास का तिनका भी हिलता तो मेरे कानों में गुदगुदी कर जाता। चिड़िया ऊपर से गुजरती तो उसकी परछाई उसके साथ साथ ज़मीन पर दौड़ती दिखती, बर्फ़ की चोटी पर बर्फ़ के पिघलने से बनी भाप गोल गोल घूम कर नाच रही थी, शायद बादल बन जाने की ख़ुशी थी उसे। सूरज नीले आसमान में ऐसे तैर रहा था जैसे उसने भी मेरी तरह इतना नीला आसमान पहली बार देखा है और एक ही दिन में पूरा आसमान नाप लेना चाहता हो। आज मेरे पास वक्त ही वक्त था मगर सवाल पूछने को पास कोई नहीं। कुछ देर बाद मैंने पाया कि दिमाग़ सवाल पूछे जा रहा है और मेरा मन हर सवाल के सटीक जवाब दिये जा रहा है। ज़िंदगी के कई सवालों के जवाब तो मेरा मन ही जानता था और मैं भटकता रहा इन सवालों के जवाब की तलाश में। बैठे बैठे शाम हो चली थी, सूरज जाते जाते मुझे रंगों की सौग़ात दे गया था और दुबला-पतला सा एक चाँद अपने संग तारों की टोली के साथ आसमान में पकड़म  पकड़ाई खेल रहा था।

सुबह की ताज़गी देख बीते कल की थकान पानी में नमक सी घुल गयी। तीसरे दिन की चढ़ाई बहुत मुश्किल थी। सामने खड़ी पहाड़ी थी और उसपर पत्थर सी सख़्त बर्फ़ जो इंसानो से चिढ़ती थी शायद। तभी तो उसके भेड़ों, खच्चरों को आराम से चढ़ने दिया और हमें बार बार नीचे धकेला। २km की चढ़ाई में हमें ३ घंटे से ऊपर का वक्त लग चुका था। मैं हिम्मत हार चुका था और गाइड को वापस लौट चलने को कहा मगर वह नहीं माना और बोला की इस बार बिना उसका हाथ थामे चलकर देखूँ। एक आख़िरी कोशिश के नाम पर मैं माँ गया और धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा। शुरुआत में कदम लड़खड़ाए मगर घुटने खुद ही सीधे होने लगे और चाल में तेज़ी आ गई। कुछ घंटो की मशक़्क़त, हाँफते लड़खाड़ते जब मैं चोटी पर पहुँचा तो लगा शरीर में साँस ख़त्म हो चुकी है, मैं घुटनो के बल बैठ गया। २-४ लम्बी साँस के बाद मैंने गर्दन उठाई तो सामने का नजारा देख कर मेरे होश उड़ गए। जिन बादलों को छूने की चाह मैं बचपन से पाले बैठा था आज मैं उनसे ऊपर उठ चुका था,  जिन पहाड़ों की ऊँचाइयों से मुझे डर लगता था आज वह सभी मेरे आगे नतमस्तक थे। मैं डूबते सूरज से नज़र मिला रहा था की तभी एक गाइड की आवाज़ आई – You did it! You achieved the success! मैंने पूछा बॉस यहीं तक में success मिल गई? हम और आगे नहीं जाएँगे? उसने सूरज की तरफ देखा और कहा। जहाँ संतुष्टि मिल जाए success वहीं है, वरना success कहीं नहीं।

मेरी आँखों में आंसू आ गए, मैंने झुक कर पहाड़ को चूमा और कहा – Now I know where to find success! You have taught me that all the answers exist within me!

Published by HimalayanDrives

While living in a city, I often escaped to the mountains to keep a balance within me. These short visits to the Himalayas and a journey of 100 days in Himachal brought me closer to nature and I started listening to the whispers of nature. This page is about converting those whispers to words and carry nature's message for all. I mostly travel solo but sometimes organise trekking camps for people who want to reach closer to nature. Join me for these trips and explore the unexplored.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: