अधूरापन

क्यूँ हम इतने अधूरे हैं के,किसी के साथ से ही पूरे हैं?फूल खुद में पूरे हैं,पेड़ खुद में पूरे हैं,नादिया खुद में पूरी है,पहाड़ खुद में पूरे हैं,धरती खुद में पूरी है, ज़िंदगी की ये राहों में, जब सब इतना हसीन है,तो फिर इस पर चल रहे दिल, क्यूँ गमगीन हैं?क्यूँ हम किसी को पानेContinue reading “अधूरापन”