प्रकृति का संगीत उत्सव

अब असंख्य बादल पानी बरसाए जा रहे हैं,
संगीत निरंतर बज रहा है,
झींगूर नाचे जा रहे हैं,
मेंढक टर टरा रहे हैं, 
धरती भी झूम उठी है,
महसूस  होता है,
प्रकृति आज संगीत उत्सव मना रही है,

अधूरापन

क्यूँ हम इतने अधूरे हैं के,किसी के साथ से ही पूरे हैं?ज़िंदगी की ये राहें, जब इतनी हसीन हैं,तो फिर इस पर चल रहे दिल, क्यूँ गमगीन हैं?क्यूँ हम किसी की चाहत में खुद को ही खो बैठते हैं?जो मिला नहीं ज़िंदगी में,जीवन भर उसी की चाह क्यूँ रखते हैं? प्यार की परिभाषा में खोना…

गंगा घाट

गंगोत्री से गंगा के घाट तक, ज़िंदगी की तलाश में,मैं आज आ पहुँचा हूँ, मृत्य तक। कई सवाल हैं मेरे ज़हन में,जो खींच लाए हैं मुझे साधुओं के इस नगर में,जीवन का तात्पर्य क्या है?अगर कर्म प्रधान इंसान को केवल कर्म करते हुए जीते रहना है,तो आखिर जीते रहने का मक़सद क्या है ?सारा जग…