तुम सच हो या कल्पना

अंधेरी रातों में,
चाँद बन जाती हो,
सर्द सुबहों में,
गर्म चाय सी लबों को छू जाती हो,
लम्बे सफ़र की दुपहरी में,
पेड़ की छाओं सी मिल जाती हो,
जो ढलने लगे ख़यालों का सूरज,
तो रंगो सी फैल जाती हो,
तुम!
तुम सच हो या कल्पना?

पूर्णमासी की रात

आज चाँद धरती के निकटतम होगा, खुद को धरती के इतना क़रीब पा, चाँद ख़ुशी से खिल उठेगा, ख़ुशी से वह अपने पूर्ण रूप में लौट, धरती को अपना चमकता चेहरा दिखलाएगा । कई दिनों के इंतज़ार के बाद,  ये दोनों चाहनेवाले, एक दूसरे के बेहद क़रीब  होंगे,  पेड़ नाचने लगेंगे, चकोर चहकने लगेगा,  सागर बहकने  लगेगा ,Continue reading “पूर्णमासी की रात”

संवाद

ये क़िस्से कहानियाँ हैं अरुण, वास्तविक जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता। इन वादियों में बैठ पहाड़, नदी, आसमान, बादल इन सबको को निहारते हुए जीवन नहीं  बिताया जा सकता। यहाँ आना और कुछ दिन ठहर वापस लौट जाना होता है, शहर में ज़माने में, समाज में। 

मेरी खिड़की

मेरे मन में ख़याल आता है कि अरे! मैं रंगों को छू सकता हूँ। मारे ख़ुशी के मैं सारे कपड़े उतार देता हूँ और अपने पूरे शरीर पर रंगों की धारियाँ को छूने लगता हूँ। मेरा रोम रोम सात रंगो की धारियों से भरा पड़ा है। मैं समझ नहीं पाता कि मैंने रंगों को ओढ़ लिया है या मैं खुद रंगों से बना हूँ। 

शब्दों का स्वाद

शब्द उबल उबल कर,
अंदर ही अंदर पकने लगते हैं,
शब्दों की सीटी बजने लगती है,
कभी छोले की मिठास सी कविता पकती है,
तो कभी राजमा की खट्टास सा छंद,
गाहे बगाहे कहानी की कोई तरकारी भी पक जाती है।

प्रकृति का संगीत उत्सव

अब असंख्य बादल पानी बरसाए जा रहे हैं,
संगीत निरंतर बज रहा है,
झींगूर नाचे जा रहे हैं,
मेंढक टर टरा रहे हैं, 
धरती भी झूम उठी है,
महसूस  होता है,
प्रकृति आज संगीत उत्सव मना रही है,

सूखे वृक्ष का संदेश

खुद को जड़ कर,
भीतर अपना रस संजोए,
वृक्ष उस वक्त के इंतज़ार में है,
जब हवा में नमी लौट आएगी,
और प्रकृति की कठोरता पिघलने लगेगी।

कुछ बिखर रहा है

कुछ बिखर रहा है शायद,
जो था कल तक संजोया,
वो सब अस्त व्यस्त हो रहा है,
दिमाग़ कहता है हाथ बढ़ा,
और समेट ले इस बिखरते हुए को,
मगर दिल कहता है
छूट जाने दे हर जकड़े हुए को,

अधूरापन

क्यूँ हम इतने अधूरे हैं के,किसी के साथ से ही पूरे हैं?फूल खुद में पूरे हैं,पेड़ खुद में पूरे हैं,नादिया खुद में पूरी है,पहाड़ खुद में पूरे हैं,धरती खुद में पूरी है, ज़िंदगी की ये राहों में, जब सब इतना हसीन है,तो फिर इस पर चल रहे दिल, क्यूँ गमगीन हैं?क्यूँ हम किसी को पानेContinue reading “अधूरापन”

सर्द सुबह

वो ओस से भीगी सड़क,तेज़ हवाओं के बीच,पेड़ों के झुरमुट की झड़प,सर्दियों की सुबह,और सुनसान राहों की तलब। जमीं पर उतर आए बादलों में,हमारा ज़माने से छिप जाना,हाथों में हाथ डाल,तेरा, मेरे कंधे पर झुक जाना,जैसे बसंत में किसी टहनी काफूलों से लद जाना। पर किसी की आहट सुन,तेरा झट से अलग हो जाना,और फिरContinue reading “सर्द सुबह”